Monday, February 28, 2011

सम्मानित व सुरक्षित घर वापसी करेंगे कश्मीरी हिंदू


 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने कश्मीर से हिंदुओं के विस्थापित होने के पीछे राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि हिंदू सम्मानित और सुरक्षित होकर अपने घर वापस लौटेंगे। भागवत ने रविवार को यहां जम्मू-कश्मीर विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित शिवरात्रि महोत्सव में उपस्थित कश्मीरी परिवारों को संबोधित करते हुए कहा, सीधी सी बात है कि कश्मीर में रहने वाले लोग कश्मीर में ही रहेंगे। इसे लेकर बेकार में भारी बवाल हो रहा है और उल्टी नीति चल रही है क्योंकि इसके पीछे राजनीति आ गई है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में कश्मीर से चार लाख हिंदू विस्थापित हो गए। अपने घर सम्मान के साथ वापस जाना उनका अधिकार है इसलिए जब तक हिंदू सम्मानित, सुरक्षित नहीं हो जाएं तब तक कश्मीर वापस नहीं जाएं। भागवत ने कहा कि स्वतंत्र भारत में इस तरह की अराजकता हो रही है और कानून की बात आती है तो कहा जाता है वहां धारा 370 है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसी बात है तो धारा 370 को हटाया क्यों नहीं जाता। उस स्थिति को बदलना चाहिए जो आजाद भारत में नागरिकों को सम्मान और सुरक्षा के साथ नहीं रहने देती। भागवत ने कश्मीरी पंडित परिवारों से आह्वान किया कि वे अपनी आने वाली पीढि़यों में भी इस भाव को बनाए रखें और अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखें। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में कट्टरपंथी लोग हैं जिनके कारण लोगों को विस्थापित होना पड़ता है। भारत में पूर्वाचल में गारो जाति इस व्यथा का उदाहरण है। सारे देश को इस स्थिति को समझना होगा। भाजपा का नाम लिए बिना संघ प्रमुख ने कहा कि इस दिशा में राजनीतिक लोग भी काम कर रहे हैं जो वहां तिरंगा फहराते हैं। एक बार वे सफल हो गए लेकिन दूसरी बार उन्हें सफल नहीं होने दिया गया और कुछ दूरी पर रोक लिया गया। इस मौके पर भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष स्मृति ईरानी ने कहा कि कश्मीरी पंडितों को लेकर नारे दिए जाते हैं लेकिन वे आज तक अपनी वापसी की तैयारी नहीं कर पाए। उन्होंने कहा, लेकिन जब हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे तो देश का राजनीतिक दृष्टिकोण बदलेगा और हम अपनी बात मनवाकर रहेंगे। इस अवसर पर सामूहिक शंखनाद भी किया गया। इससे पहले भागवत और स्मृति को परंपरागत कश्मीरी वेशभूषा पहनाकर उनका सम्मान किया गया|

मलेशिया में 100 से अधिक हिंदू गिरफ्तार


मलेशिया में रविवार को हिंदुओं के प्रतिबंधित संगठन हिंद्राफ से जुड़े एक समूह के 109 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारियां उस वक्त हुई जब ये मलय भाषा में लिखे विवादास्पद उपन्यास इंटरलोक को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने के विरोध में रैली निकाल रहे थे। देश में भारतीय मूल के लोगों की सबसे बड़ी पार्टी मलेशियन इंडियन कांग्रेस (एमआइसी) सहित अल्पसंख्यक समुदाय का मानना है कि उपन्यास में भारतीय मूल के लोगों को लेकर आपत्तिजनक टिप्प्णी की गई हैं। गिरफ्तार लोगों में आठ महिलाएं भी हैं। ये हिंदू राइट्स एक्शन फोर्स (हिंद्राफ) के ह्यूमन राइट्स पार्टी समूह से जुड़ी हैं। सरकार ने इस रैली को अवैध घोषित किया था। शहर के पुलिस उपायुक्त जे. अब्दुल्ला ने कहा कि यह गिरफ्तारियां शहर की कानून और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए की गई हैं। उन्होंने कहा, हमें खेद है, लेकिन हम उन्हें कई बार रैली नहीं निकालने की चेतावनी दे चुके हैं। उसके बावजूद रैली निकालना कानून के प्रति उनके गैरजिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। सरकार ने हालांकि आश्वासन दिया है कि संशोधन के बाद ही पुस्तक को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया|

Thursday, February 17, 2011

भगवा आतंक की राजनीति


हिंदुत्ववादी संगठनों के खिलाफ मोर्चा पर रमेश शर्मा की टिप्पणी
आतंकवाद पर हर सरकार का अपना नजरिया होता है। यह नजरिया उसकी फाइलों में और उसके द्वारा लिखाए गए इतिहास में साफ दिखता है। बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी को आतंकवादी घोषित करके जिंदा अथवा मुर्दा पकड़ने का हुक्म सुनाया था। अंग्रेजों ने सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को आतंकवादी माना था। मुगल समर्थक इतिहास की किताबों में आज भी शिवाजी को आतंकवादी लिखा जाता है। आतंकवाद पर सरकारों के नजरिए का यह एक उदाहरण है। इसके अतिरिक्त गुरुगोविंद सिंह, गुरु तेगबहादुर हरि सिंह नलवा, तात्याटोपे आदि को भी तत्कालीन सरकारों ने आतंकवादी माना था। इन तमाम लोगों के प्रति भारतीय समाज में आदर है। ये तमाम विभूतियां राष्ट्र के लिए अपनी जिंदगियां न्यौछावर कर गए। जब प्रधानमंत्री अथवा उनकी सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को या उसके किसी प्रचारक को आतंकवाद की घटनाओं में लिप्त घोषित करती है तो मिश्रित प्रतिक्रिया होती है। आरएसएस के बारे में दो बातें बहुत साफ हैं। एक तो उसकी और उसके सेवकों की निष्ठा राष्ट्र के प्रति असंदिग्ध है और दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी न तो हिंसा का समर्थन किया है और न हिंसा को कभी प्रश्रय दिया है। बावजूद इसके मालेगांव और अजमेर विस्फोट जैसी वारदातों में संघ के स्वयंसेवकों के नाम सामने आने पर पूरे देश में सनसनी-सी फैली। इससे कांग्रेस को मौका मिला है आरएसएस पर हमला करने का और इस हमले के बहाने अपनी राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा को दबाने का। इससे भारत को भीतर से कमजोर करने वाली ताकतें प्रसन्न हैं। निसंदेह देश में जितने भी आतंकवादी हमले हुए उनमें राष्ट्रबोध मजबूत हुआ और संघ के सेवकों ने अपनी सेवा से जन सहानुभूति भी बटोरी है। माना जाता है कि संघ द्वारा अर्जित सहानुभूति चुनाव में भाजपा की ओर झुक जाती हैं। कांग्रेस की यही चिंता भी है। कांग्रेस की चिंता तब और पैनी होती है जब उसे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में पराजय मिलती है अथवा आंध्र जैसे प्रांत से सत्ता की डगमगाहट की खबरें आती हैं। वह आरएसएस पर हमला तेज करती है ताकि मीडिया का ध्यान बिहार में हार के विश्लेषण के बजाय आरएसएस और आतंकवाद की विवेचना की ओर मुड़ जाए। कांग्रेस यह अच्छी तरह जानती है कि भारत में आतंकवाद का मार्ग पाकिस्तान और चीन की सीमा से निकलता है, लेकिन यह आतंक कितना ही भयानक क्यों न हो, राष्ट्र के लिए कितना ही घातक क्यों न हो फिर भी उसकी सरकार को नुकसान नहीं है इसीलिए वह इस आतंकवाद पर हमला नहीं करती। इस आतंकवाद के समर्थन में दिल्ली में खुलेआम बयानबाजी पर वह गिलानी या अरुंधती पर कोई कार्रवाई नहीं करती। कांग्रेस को हिंदुत्ववादी संगठनों से खतरा दिखता है इसलिए वह उनके खिलाफ मोर्चा खोल देती है। यह सरकार की अपनी शैली है जिसमें वह आतंकवाद की परिभाषा गढ़ती है और किसी को भी आतंकवादी घोषित करके इतिहास बना देती है। वस्तुत: भारत की तमाम सरकारों को प्रखर राष्ट्रवाद से ही खतरा रहा है इसीलिए भारत सरकार का चरित्र ही ऐसा बन गया है कि वह राष्ट्रवाद से चौंके और देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को प्राथमिकता देने से परहेज करे। उनके विरुद्घ जितने दमन हो सकते हैं, जितने प्रतिबंध हो सकते हैं वह लगाए। ऐसा शकों के शासन में भी था और कुषाणों के शासन में भी। ऐसा तुर्को के शासन में भी था और पठानों के में भी, ऐसा मुगलों के शासन में भी था और अंग्रेजों के शासन में भी इसीलिए आजादी के बाद की तमाम सरकारों का स्वभाव है कि जो लोग सत्ता के बाहर प्रखर राष्ट्रवाद की बात करते हैं उन्हें दबाया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, February 15, 2011

हिंदू कट्टरपंथ अभी बड़ा खतरा नहीं : पिल्लै


सरकार का मानना है कि देश में हिंदू कट्टरपंथ (दक्षिणपंथी तत्वों) का उभरना चिंता की बात है लेकिन अभी यह बड़ा खतरा नहीं है। केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लै ने कहा, इन्हें फलने-फूलने दिया गया तो देश की सुरक्षा के लिए यह खतरा बन सकता है। पिल्लै ने यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा, हमें जो भी खुफिया जानकारी मिल रही हैं उसके आधार पर फिलहाल दक्षिण कट्टरपंथी बड़ा खतरा नहीं हैं लेकिन कट्टरपंथी संगठनों की संख्या बढ़ना चिंता की बात तो है ही। स्वामी असीमानंद द्वारा 2006 के मालेगांव विस्फोट में हिन्दू समूहों के हाथ होने की बात स्वीकारे जाने के संदर्भ में उन्होंने कहा, पूर्व के विस्फोटों में निर्दोष युवकों को फंसाने के लिए जो भी पुलिस अधिकारी दोषी पाए गए, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह पूछने पर कि मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट जैसे मामलों में अब दक्षिण कट्टरपंथी संगठनों के कथित रूप से शामिल होने का खुलासा होने के बाद ऐसे मामलों में शुरुआत में गिरफ्तार मुस्लिमों की रिहाई के संबंध में पूछे जाने पर पिल्लै ने कहा कि निर्दोष मुस्लिम युवकों को रिहा करने की प्रक्रिया चल रही है। गृह सचिव ने कहा कि दक्षिणपंथी हो या कोई अन्य, आतंकी देश का दुश्मन होता है। उन्होंने कहा कि भारत किसी भी तरह के कट्टरपंथी समूहों के फलने फूलने का जोखिम नहीं उठा सकता है। हमारा मानना है कि दक्षिणपंथी कट्टरवादी समूह अभी बहुत सीमित हैं। ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटने का संकेत देते हुए पिल्लै ने कहा, हमारे दृष्टिकोण से आतंकवाद में संलग्न हर व्यक्ति देश का शत्रु है। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, पाक से समझौता विस्फोट से जुड़ी जानकारी अवश्य साझा की जाएगी लेकिन आरोपपत्र दाखिल होने के बाद, क्योंकि जांच अभी चल रही है। पाक समझौता कांड से जुड़ी जानकारी लगातार मांग रहा है। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी कर रही है और इस सिलसिले में गिरफ्तार असीमानंद से पूछताछ की जा रही है। पिल्लै ने कहा कि अभी भी कई लोग गिरफ्तार नहीं हो पाए हैं। यह पूछने पर कि समझौता मामले सहित कुछ आतंकी घटनाओं में कथित तौर पर दक्षिणपंथी संगठनों के लिप्त होने से भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में किसी तरह का कोई असर तो नहीं पड़ेगा या फिर भारत को किसी तरह का दबाव तो नहीं झेलना होगा, पिल्लै ने कहा कि दबाव तो है लेकिन इसका बातचीत पर कोई असर नहीं होगा। क्योंकि लोकतंत्र में लोग इस तरह की बातों को अच्छी तरह समझते हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी हेमंत करकरे के बीच कथित बातचीत का मुंबई हमले से कोई लेना-देना था या नहीं, इस सवाल पर पिल्लै ने कहा कि मैं नहीं मानता। उनकी बातचीत का मुंबई आतंकी हमले से कोई लेना-देना नहीं है।

Monday, February 14, 2011

40 साल बाद अस्थियों को नसीब हुई गंगा की गोद


पाकिस्तान से विसर्जन के लिए हरिद्वार लाई गई 135 हिंदुओं की अस्थियां 40 साल के लंबे इंतजार के बाद रविवार को विधि विधान के साथ गंगा में विसर्जित कर दी गयीं। इससे पहले पहले शहर में बैंड बाजों के साथ अस्थि कलश यात्रा निकाली गई। पाकिस्तान से आए बारह सदस्यीय दल ने हरिद्वार में अस्थियों को विसर्जित किया। उल्लेखनीय है कि भारत का वीजा न मिलने के चलते यह अस्थियां पिछले करीब चालीस साल से पाक में संभालकर रखी गई थी। यह अस्थि कलश शनिवार देर रात दिल्ली से हरिद्वार पहुंचे और इन्हें निष्काम सेवा सदन में रखा गया था। शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने रविवार सुबह हरिद्वार के निष्काम सेवा सदन से अस्थि कलश यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। बैंड-बाजों के साथ अस्थि कलश यात्रा का जगह जगह पर शहरवासियों ने स्वागत किया। दोपहर करीब दो बजे कनखल सती घाट में विधि-विधान से अस्थियों को गंगा में विसर्जित कर दिया गया। इसके लिए पाकिस्तान के श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के महंत रामनाथ मिश्र की अगुवाई में मंदिर के 12 सेवक हरिद्वार आए थे। अस्थि विसर्जन के मौके पर धर्मयात्रा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मांगे राम, श्री देवोत्थान सेवा समिति के अध्यक्ष अनिल नरेंद्र, कालिका पीठाधीश्र्वर महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबा हठयोगी, समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। पाकिस्तान के कराची शहर मेंस्थित हिंदू क्रिमिनेशन ग्राउंड के एक कमरे में 135 दिवंगत व्यक्तियों के अस्थि कलश चालीस साल से रखे हुए थे। भारत का वीजा न मिल पाने के चलते इनका गंगा में विसर्जन नहीं हो पा रहा था। करीब चार साल पहले दिल्ली स्थित श्री देवोत्थान समिति को इस बारे में पता चला। फिर इन अस्थि कलशों को भारत लाकर गंगा में प्रवाहित करने की मुहिम शुरू हुई। पाकिस्तान के कराची शहर में श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के महंत रामनाथ मिश्र से समिति ने संपर्क किया। तमाम प्रयासों के बाद आखिरकार इस मुहिम को आज मंजिल तक पहुंचाया गया।