हिंदुत्ववादी संगठनों के खिलाफ मोर्चा पर रमेश शर्मा की टिप्पणी
आतंकवाद पर हर सरकार का अपना नजरिया होता है। यह नजरिया उसकी फाइलों में और उसके द्वारा लिखाए गए इतिहास में साफ दिखता है। बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी को आतंकवादी घोषित करके जिंदा अथवा मुर्दा पकड़ने का हुक्म सुनाया था। अंग्रेजों ने सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को आतंकवादी माना था। मुगल समर्थक इतिहास की किताबों में आज भी शिवाजी को आतंकवादी लिखा जाता है। आतंकवाद पर सरकारों के नजरिए का यह एक उदाहरण है। इसके अतिरिक्त गुरुगोविंद सिंह, गुरु तेगबहादुर हरि सिंह नलवा, तात्याटोपे आदि को भी तत्कालीन सरकारों ने आतंकवादी माना था। इन तमाम लोगों के प्रति भारतीय समाज में आदर है। ये तमाम विभूतियां राष्ट्र के लिए अपनी जिंदगियां न्यौछावर कर गए। जब प्रधानमंत्री अथवा उनकी सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को या उसके किसी प्रचारक को आतंकवाद की घटनाओं में लिप्त घोषित करती है तो मिश्रित प्रतिक्रिया होती है। आरएसएस के बारे में दो बातें बहुत साफ हैं। एक तो उसकी और उसके सेवकों की निष्ठा राष्ट्र के प्रति असंदिग्ध है और दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी न तो हिंसा का समर्थन किया है और न हिंसा को कभी प्रश्रय दिया है। बावजूद इसके मालेगांव और अजमेर विस्फोट जैसी वारदातों में संघ के स्वयंसेवकों के नाम सामने आने पर पूरे देश में सनसनी-सी फैली। इससे कांग्रेस को मौका मिला है आरएसएस पर हमला करने का और इस हमले के बहाने अपनी राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा को दबाने का। इससे भारत को भीतर से कमजोर करने वाली ताकतें प्रसन्न हैं। निसंदेह देश में जितने भी आतंकवादी हमले हुए उनमें राष्ट्रबोध मजबूत हुआ और संघ के सेवकों ने अपनी सेवा से जन सहानुभूति भी बटोरी है। माना जाता है कि संघ द्वारा अर्जित सहानुभूति चुनाव में भाजपा की ओर झुक जाती हैं। कांग्रेस की यही चिंता भी है। कांग्रेस की चिंता तब और पैनी होती है जब उसे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में पराजय मिलती है अथवा आंध्र जैसे प्रांत से सत्ता की डगमगाहट की खबरें आती हैं। वह आरएसएस पर हमला तेज करती है ताकि मीडिया का ध्यान बिहार में हार के विश्लेषण के बजाय आरएसएस और आतंकवाद की विवेचना की ओर मुड़ जाए। कांग्रेस यह अच्छी तरह जानती है कि भारत में आतंकवाद का मार्ग पाकिस्तान और चीन की सीमा से निकलता है, लेकिन यह आतंक कितना ही भयानक क्यों न हो, राष्ट्र के लिए कितना ही घातक क्यों न हो फिर भी उसकी सरकार को नुकसान नहीं है इसीलिए वह इस आतंकवाद पर हमला नहीं करती। इस आतंकवाद के समर्थन में दिल्ली में खुलेआम बयानबाजी पर वह गिलानी या अरुंधती पर कोई कार्रवाई नहीं करती। कांग्रेस को हिंदुत्ववादी संगठनों से खतरा दिखता है इसलिए वह उनके खिलाफ मोर्चा खोल देती है। यह सरकार की अपनी शैली है जिसमें वह आतंकवाद की परिभाषा गढ़ती है और किसी को भी आतंकवादी घोषित करके इतिहास बना देती है। वस्तुत: भारत की तमाम सरकारों को प्रखर राष्ट्रवाद से ही खतरा रहा है इसीलिए भारत सरकार का चरित्र ही ऐसा बन गया है कि वह राष्ट्रवाद से चौंके और देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को प्राथमिकता देने से परहेज करे। उनके विरुद्घ जितने दमन हो सकते हैं, जितने प्रतिबंध हो सकते हैं वह लगाए। ऐसा शकों के शासन में भी था और कुषाणों के शासन में भी। ऐसा तुर्को के शासन में भी था और पठानों के में भी, ऐसा मुगलों के शासन में भी था और अंग्रेजों के शासन में भी इसीलिए आजादी के बाद की तमाम सरकारों का स्वभाव है कि जो लोग सत्ता के बाहर प्रखर राष्ट्रवाद की बात करते हैं उन्हें दबाया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
बंधू आपका प्रयास सराहनीय और सामयिक है. वाम और वंश की चरण-वन्दना में लीन मीडिया के इस अंधे युग में राष्ट्रवादी -हिन्दुत्ववादी विचारों को प्रसार और सेकुलरवाद की काली असलियत का पर्दाफ़ाश सख्त जरूरी है. यह प्रयास निरंतर जारी रखे. सम-विचारी लेखको के समूह 'आह्वान' से जुड़े. इसका लिंक मेरे ब्लॉग पर उपलब्ध है.
ReplyDeleteबहुत अच्छी प्रस्तुति| धन्यवाद|
ReplyDeleteउत्तम प्रस्तुति...
ReplyDeleteहिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है, कामना है कि आप इस क्षेत्र में सर्वोच्च बुलन्दियों तक पहुंचें । आप हिन्दी के दूसरे ब्लाग्स भी देखें और अच्छा लगने पर उन्हें फालो भी करें । आप जितने अधिक ब्लाग्स को फालो करेंगे आपके अपने ब्लाग्स पर भी फालोअर्स की संख्या बढती जा सकेगी । प्राथमिक तौर पर मैं आपको मेरे ब्लाग 'नजरिया' की लिंक नीचे दे रहा हूँ आप इसके आलेख "नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव" का अवलोकन करें और इसे फालो भी करें । आपको निश्चित रुप से अच्छे परिणाम मिलेंगे । शुभकामनाओं सहित...
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