मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शासकीय सेवकों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में जाने का आह्वान किया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि संघ ईमानदारी, राष्ट्र प्रेम और परिश्रम करना सिखाता है। इसलिए उसकी शाखाओं में जाने से परहेज क्यों। मुख्यमंत्री ने स्थानीय रवीन्द्र भवन में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित पत्रकारिता पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान यह टिप्पणी की। उस समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह सरकार्यवाह भैयाजी जोशी और पूर्व प्रचार प्रमुख एमजी वैद्य मंच पर मौजूद थे। चौहान ने कांग्रेस का नाम लिए बिना कहा कि वह जब मुख्यमंत्री बने तो उन्हें पता चला कि मध्य प्रदेश में संघ की शाखाओं में सरकारी अफसरों और कर्मचारियों के जाने पर रोक है। हमारी सरकार ने सारे प्रतिबंध हटा दिए हैं। शासकीय सेवक अब संघ की शाखाओं में बेधड़क जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा ऐसे हिंदुत्व में विश्र्वास करती है, जो किसी से भेदभाव नहीं सिखाता। हमारी सरकार की हर योजना में अल्पसंख्यकों को शामिल किया जाता है। संघ की शाखाओं में सरकारी कर्मचारियों के जाने पर दिग्विजय सिंह सरकार में प्रतिबंध लगाया गया था। उनकी सरकार में संघ की शाखाओं में जाने वाले कर्मचारियों की सूची भी बनाई गई थी। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के बयान की आलोचना की है। राज्य विधानसभा में कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने कहा है कि मुख्यमंत्री सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों पर शाखा में जाने के लिए दबाव डालकर अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। वह अधिकारियों-कर्मचारियों की आजादी छीन रहे हैं। यह निंदनीय ह|
Monday, March 28, 2011
Saturday, March 26, 2011
Tuesday, March 22, 2011
हिंदू आतंक के मामले एनआइए जांचेगी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले में मध्य प्रदेश की सहमति नहीं मिलने के बावजूद केंद्र सरकार इसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को सौंपने जा रही है। जल्दी ही जोशी हत्याकांड सहित आतंकवाद के ऐसे कई मामलों को इसे सौंपा जा रहा है। इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) पहले से ही जांच कर रहा है। हालांकि पिछले ही दिनों हुए विकिलीक्स खुलासे के अनुसार गृहमंत्री पी. चिदंबरम का मानना है कि एनआइए को राज्य की सहमति बिना जांच सौंपना संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ है। गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक समझौता धमाके की ही तरह इस तरह के दूसरे सभी मामले एनआइए को जल्दी ही सौंप दिए जाएंगे। इसमें मध्य प्रदेश में सुनील जोशी हत्याकांड भी शामिल है। हालांकि इस मामले की जांच कर राज्य पुलिस पहले ही आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। इसमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का भी नाम है। साध्वी को समझौता धमाके में भी आरोपी पाया गया है। गृह मंत्रालय एनआइए को यह जांच सौंपने से पहले कानून मंत्रालय की सलाह का इंतजार कर रहा है। गृह मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से कुछ समय पहले इस बारे में कानूनी स्थिति समझनी चाही थी। क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने यह मामला एनआइए को सौंपने के केंद्र के अनुरोध को नहीं माना है। जबकि एनआइए कानून के मुताबिक आंतकवाद से जुड़े किसी भी मामले की जांच केंद्र बिना राज्य की सहमति के ही इसे सौंप सकती है। लेकिन पिछले दिनों ही हुए विकिलीक्स खुलासे में यह तथ्य सामने आया था कि गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने यह कानून बनने के तुरंत बाद अमेरिकी राजदूत के साथ बातचीत में उन्हें बताया था कि यह कानून भारत की संघीय भावना के खिलाफ है इसलिए अगर इसे कानूनी चुनौती मिली तो समस्या आ सकती है। सभी मामलों को एनआइए को सौंपने के पीछे गृह मंत्रालय का तर्क है कि पिछले कुछ साल के दौरान हुए एक जैसे कई मामलों की जांच कई अलग-अलग एजेंसियां कर रही हैं। मालेगांव में हुए एक धमाके की जांच सीबीआइ के पास है, जबकि वहीं हुए दूसरे मामले की जांच राज्य पुलिस कर रही है। इसी तरह 2007 में ही हुए मक्का मस्जिद धमाके की जांच सीबीआइ के पास है, वहीं अजमेर धमाके की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी राजस्थान एटीएस के पास है। इससे जांच प्रभावित होती है और अदालती कार्यवाही में भी समस्या आती है|
मस्जिद के लिए अलग जमीन
इसी साल जनवरी में जंगपुरा इलाके में अतिक्रमण करके बनाए गए धार्मिक स्थल को गिराने के मामले में सोमवार को दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने उच्च न्यायालय को बताया है कि वह इस धार्मिक स्थल के बदले में इसका रखरखाव करने वाली नूर चैरिटेबल सोसायटी को एक अलग स्थान पर चार सौ गज जमीन देने के लिए तैयार है। डीडीए की तरफ से दी गई इन दलीलों के बाद न्यायमूर्ति जीएस सिस्तानी ने सोसायटी को कहा है कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करे। जब उनको नई जमीन मिल जाए तो वह उस जगह को खाली कर दे जिस पर पहले धार्मिक स्थल बना हुआ था। तब तक इस स्थल पर पुराने आदेश के अनुसार दस लोग ही नमाज पढ़े। डीडीए की तरफ से यह भी बताया गया कि उन्होंने गिराए गए धार्मिक स्थल के चारों और दीवार का निर्माण कर दिया है। इतना ही नहीं इस स्थल से सौ मीटर की दूरी पर वह सोसायटी को चार सौ गज जमीन देने को तैयार है। पूर्व में अदालत के आदेश के बाद डीडीए ने उसकी जमीन पर बने धार्मिक स्थल को गिरा दिया था। परंतु स्थानीय लोगों द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद अदालत ने डीडीए को कहा था कि वह इस जमीन पर चार दीवारी कर दे। दो माह के अंदर समस्या का समाधान निकाला जाए तब तक दस लोग इस स्थल पर नमाज पढ़ सकेंगे। याचिकाकर्ता की तरफ से एक बार फिर कहा गया कि अदालत के पूर्व में दिए गए आदेश का पालन नहीं हो रहा है। जबकि सोसायटी की तरफ से बताया गया कि वह अदालत के आदेश का पालन करेंगे और दस से ज्यादा लोग नमाज नहीं पढ़ेगे। जिस पर अदालत ने सोसायटी व दिल्ली वक्फ बोर्ड को कहा कि वह अदालत के आदेश का आदर करे। साथ ही डीडीए को कहा कि उन्होंने जमीन के चारों तरफ दीवार बनाई है। अगर कोई उसे तोड़ता है तो उसे दोबारा बनाना उनकी जिम्मेदारी है। इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि अदालत को कानून को अपने हाथ में लेने की अनुमति किसी को नहीं देगी। सोसायटी व बोर्ड के वकीलों ने इस विषय पर विचार करने और कोई समाधान निकालने के लिए अदालत से कुछ समय दिए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि वह कानून का पालन करेंगे। जिस पर अदालत ने मामले की सुनवाई 16 मई तक टाल दी। अदालत जंगपुरा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है|
Sunday, March 6, 2011
मालेगांव धमाके में एटीएस ने बिना सबूत बनाए आरोपी
सीबीआइ ने वर्ष 2006 में हुए मालेगांव विस्फोट की नए सिरे से जांच की मांग के बीच रविवार को संकेत दिया कि मुंबई पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने इस मामले को सुलझाने में काफी जल्दी दिखाई। इसका नतीजा यह हुआ कि एटीएस ने दो लोगों को इस बात का ध्यान रखे बिना ही आरोपी बना दिया कि घटना के समय उनमें से एक जेल में था, जबकि दूसरा शहर से 700 किलोमीटर दूर। एटीएस के आरोपपत्र में दावा किया गया है कि विस्फोट कांड के मुख्य आरोपी में से एक मोहम्मद जाहिद आठ सितंबर को मालेगांव में मौजूद था जब तीन विस्फोट हुए जिसमें 35 से अधित व्यक्तियों की मौत हो गई थी। सीबीआइ मालेगांव विस्फोट की गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश कर रही है। उसके पास इस बात को प्रमाणित करने के लिए प्रत्यक्षदर्शी मौजूद हैं कि विस्फोट वाले दिन जाहिद मालेगांव से 700 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव में शुक्रवार की नमाज का नेतृत्व कर रहा था। सीबीआइ के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि जाहिद पर आरोप है कि वह प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट इस्लामी मूवमेंट ऑफ इंडिया की गतिविधियों में शामिल था। बहरहाल, वह विस्फोट स्थल पर मौजूद नहीं था। सीबीआइ ने यह भी दावा किया उसके पास धमाके के महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी के बयान भी दर्ज हैं। प्रत्यक्षदर्शी ने जांच एजेंसी को बताया था कि मालेगांव में बम रखने वाले को दाढ़ी नहीं थी, जबकि एटीएस ने जिसे आरोपी बनाया है उसने सालों से दाढ़ी बढ़ा रखी है। सीबीआइ को और भी कई ऐसे सबूत मिले जिनसे पता चलता है कि एटीएस ने जांच में जल्दबाजी दिखाई। गौरतलब है कि इस सारी जांच में उस समय नया मोड़ आ गया था जब संघ से जुड़े स्वामी असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के सामने यह बयान दिया दिया कि मालेगांव विस्फोट के पीछे हिंदू कट्टरपंथियों का हाथ है। इसके बाद इस पूरे मामले की मुंबई एटीएस से लेकर जांच सीबीआइ को सौंपी गई|
Wednesday, March 2, 2011
Tuesday, March 1, 2011
पाकिस्तान से नाता तोड़ते हिंदू
पिछले दिनों पाकिस्तान के सिंध प्रांत की विधानसभा के एक सदस्य अपना देश हमेशा के लिए छोड़ कर भारत में बस गए। राम सिंह सोढो ने भारत से अपना त्यागपत्र भेज दिया, जिसमें लिखा है कि स्वास्थ्य बेहतर नहीं है और डॉक्टर ने दो साल आराम की सलाह दी है। सिंध विधानसभा के अध्यक्ष ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। हम जानते हैं कि राम सिंह के त्यागपत्र का कारण सेहत की खराबी नहीं हो सकता। हो सकता है कि उनकी सेहत वास्तव में खराब हो, लेकिन यह देश छोड़ने का कारण तो नहीं हो सकता। राम सिंह पहले ऐसे राजनेता नहीं हैं, जिन्होंने अपना देश छोड़ कर भारत का रुख किया है। इससे पहले भी चार सदस्य भारत में बस चुके हैं। सबसे पहले देश छोड़ने वाले पाकिस्तान के पहले विधिमंत्री जगन्नाथ मंडल थे। इसके बाद संसद सदस्य लक्ष्मण सिंह ने वर्ष 1973 में देश को अलविदा कहा और हमेशा के लिए भारत में आबाद हो गए। राम सिंह से पहले महरूमल जगवाणी भी भारत को अपना चुके हैं। वह सिंध विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार सब नागरिक बराबर हैं। संविधान कहता है कि सभी धर्मो के लोग एक जैसे हैं, सबके अधिकार बराबर हैं और सबको धर्म की मुकम्मल आजादी है। ये बातें संविधान में तो हैं, लेकिन सच क्या है, यह देखना जरूरी है। अगर यह सब सच होता या इस पर अमल होता तो लोग इस तरह अपना देश नहीं छोड़ते जिस तरह राम सिंह या इन जैसे कई लोग छोड़ चुके हैं। ये हालत इसलिए पैदा होते हैं, क्योंकि पाकिस्तान में कोई भी देश के संविधान की परवाह नहीं करता। आतंकवाद, चरमपंथ के साथ देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। दो-तीन मामले हैं जिनको लेकर हिंदू परेशान हैं। एक तो हिंदुओं को लगता है कि उनकी सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। हिंदुओं को शिकायत है कि राज्य उनकी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं करता। यह शिकायत सही भी है। पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून और दूसरे कानूनों के दुरुपयोग का डर भी हिंदुओं के सिर पर सवार रहता है। एक रिपोर्ट आई है कि पाकिस्तान से रोजाना एक हिंदू परिवार दूसरे देश में प्रवास कर रहा है। अगर इस बात को सच न भी माना जाए तो भी यह सच जरूर है कि देश के 60 प्रतिशत हिंदू देश छोड़ने की सोचते जरूर हैं। हिंदू समूहों की त्रासदी यह है कि वे देश में रहना चाहते हैं, लेकिन अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं। दूसरी ओर भारत उन्हें कबूल नहीं करता। कई सियासी लोगों से हमने सुना है कि देश में हमें कोई पूछता नहीं और भारत भी कहता है कि तुम्हें हम कोई सुविधा नहीं दे सकते। हम आखिर जाएं तो कहां जाएं। यह कहा जा सकता है कि अगर पाकिस्तान और भारत के बीच वीजा प्रणाली आसान होती तो कई हिंदू देश छोड़ चुके होते। देश के हिंदू भी इतने ही देशभक्त और प्रतिबद्ध हैं जितने मुसलमान। फिर भी अल्पसंख्यक होने की वजह से वे इस डर में जीते हैं कि कहीं उन पर यह आरोप न लग जाए कि वे भारत से जुड़े हैं। पाकिस्तान में अधिकांश हिंदू सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में बसते हैं। दोनों प्रांतों में उन समूहों की हालत अच्छी नहीं है। दोनों प्रांतों के कई शहरों से अपहृत हुए हिंदू आज भी वापस घर नहीं लौट सके हैं। बलूचिस्तान में काम करने वाले मानवाधिकार आयोग के निदेशक सईद अहमद का कहना है कि प्रांत में अपहरण के कारण हिंदुओं में ज्यादा डर है। इस कारण ही वे तेजी से देश से पलायन कर रहे हैं। अधिकांश हिंदू भारत जाते हैं। अगर वहां नहीं जा पाते तो दूसरे देश में जाने की कोशिश करते हैं, जिसके लिए वे अपनी संपत्ति सस्ते दामों में बेच देते हैं। सिंध प्रांत में जैकब आबाद जिले में रहने वाले हिंदू भी मुश्किल में हैं। यह वह जिला है, जहां तीन साल के बच्चों का भी अपहरण हो चुका है। वहां से भी रिपोर्ट है कि काफी हिंदू भारत चले गए हैं। जो शेष रह गए हैं वे भी जाने की बातें कर रहे हैं। मेरा मानना है कि दोनों देशों की जनता को खुली छूट होनी चाहिए कि वे जहां जाना चाहें, वहां जा सकते हैं। अगर इस तरह का माहौल हो तो किसी को देश छोड़ने की जरूरत ही पेश नहीं आएगी। दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के पास जाएंगे, मेलमिलाप का एक बहाना होगा, लेकिन दुर्भाग्य है कि दोनों देशों ने जनता के लिए इतने कठिन नियम बना दिए हैं कि एक-दूसरे के देश आने-जाने की सोच भी नहीं पाते। दूतावास अधिकारियों को भी शायद ऐसा ही प्रशिक्षण मिलता है जो खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को दिया जाता है। यानी जो भी पाकिस्तान से भारत जाए, उसे जासूस समझा जाए। दिल्ली में पाकिस्तान के दूतावास का भी यही हाल होगा। इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं है कि पाकिस्तान और भारत की विदेश नीतियों से जनता में प्यार बढ़ता है या नफरत? देश जनता से बनते हैं। जनता को संतुष्ट करने के लिए सब-कुछ करना चाहिए। दुश्मनी के सिवा भी कुछ सोचा जाना चाहिए। (लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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